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रविवार, 14 अक्टूबर 2018

समय है संभावना का - जगदीश पंकज / राजेन्द्र वर्मा

आज नवगीत अथवा किसी भी विधा में सामयिक यथार्थ से कटी हुई रचना का कोई महत्त्व नहीं। वायवीय और अमूर्तन से पृथक् यथार्थ के धरातल पर सर्जना और संवेदना की रक्षा का ध्येय ही वास्तविक रचनाधर्मिता है। इस दृष्टि से नवगीत का सरोकार स्पष्ट है और वह अपनी भूमिका सजगता से निभा रहा है। कहना न होगा, आज कितने ही नवगीतकार समय से मुठभेड़ करने में लगे हैं और उनके संग्रहों से हिन्दी काव्य समृद्ध हो रहा है, यद्यपि साहित्य की मुख्य धारा में अभी उसका आकलन शेष है । ऐसे में श्री जगदीश पंकज के नवीनतम संग्रह, समय है सम्भावना का, का आना सुखद है।

समीक्ष्य संग्रह में उनके 69 नवगीत हैं जिनमें सत्ता के छल-छद्म के विविध चित्र खींचे गये हैं। ये चित्र जिस तथ्य को सामने लाते हैं, वे हमारे जाने-पहचाने हैं, लेकिन उनके चित्रण का अन्दाज़ जुदा है। कहीं उनकी अभिव्यक्ति मारक है, तो कहीं आम आदमी को सान्त्वना देने वाली है। इन नवगीतों में तमाम विद्रूपताओं, विडम्बनाओं और हतप्रभ करने वाली स्थितियों पर विजय पाने की ललक बसती है। कवि की दृष्टि अनुभवसम्पन्न है। इससे पूर्व उसके दो नवगीत-संग्रह, सुनो मुझे भी और निषिद्धों की गली का नागरिक प्रकाशित और समादृत हो चुके हैं।...नवगीतकार का मानना है कि आज विरुद्धों के समन्वय का समय है। सृजन की संभावना के वर्तमान दौर में उसने युगीन यथार्थ को स्वर देने के साथ-साथ समय पर प्रतिक्रियास्वरूप अनुभूति के संवेदन को अभिलेखित किया है।... संग्रह से गुजरने पर उसके इस कथन की पुष्टि होती है। साथ-ही, यह सन्तोषप्रद लगता है कि जीवनमूल्यों के निरन्तर क्षरण होते जाने के बावजूद नवगीतकार निराशा के सागर में नहीं डूबता; वह अपने उस संकल्प को विविध रूपों में दुहराता है जो जीवन की उदात्तता को स्थापित करते हैं। इस प्रक्रिया में कवि रचनाधर्मिता को नये-नये आयाम देता है। हिन्दी कविता के जो आलोचक नवगीत कविता पर यह आरोप लगा उसे ख़ारिज कर देते हैं कि गीत वर्तमान यथार्थ की जटिलता खोलने में अक्षम है, उनके लिए यह संग्रह चुनौती देता हुआ प्रतीत होता है।

सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता वाले हमारे समाज के सामने आज साझी विरासत और वैचारिक स्वतंत्रता पर जो संकट मंडरा रहा है, वह इससे पहले नहीं था, यद्यपि आम आदमी के सामने आर्थिक अभाव और उसके जीवन को दुश्वार करने वाली तमाम बातें मौज़ूद थीं। तब ग़रीब आदमी आपस में मिल-बैठकर कुछ रास्ते निकाला करते थे, जिन्हें निकालने का काम सत्ता-व्यवस्था का था, पर इस प्रक्रिया में धर्म-संस्कृति आड़े नहीं आती थी। आज सामाजिक सद्भाव को जैसे हाईजैक कर लिया गया हो और सहिष्णुता को आहत कर अस्मिता के टकराव की स्थितियाँ उत्पन्न कर दी गयी हैं। सहअस्तित्त्व की अवधारणा ही ख़तरे में है। आश्चर्य की बात यह है कि यह कारनामा सत्ताविरोधी शक्तियों द्वारा नहीं किया गया, बल्कि स्वयं सत्ता द्वारा किया जा रहा है। आर्थिक खाई बढाने के साथ-साथ दुनिया को बाज़ार में बदलने को आतुर पूँजी द्वारा पोषित सत्ता की यह रणनीति अभावग्रस्तता बढ़ा ही रही है, सामाजिक विघटन भी उत्पन्न कर रही है और परिणाम यह है कि लोग भारतीय होने के बजाय छद्म धार्मिक नागरिक हो रहे हैं।... नवगीतकार ने सत्ता के इस षड्यन्त्रकारी चरित्र को संग्रह के अनेक नवगीतों में विविधवर्णी बिम्बों में पूरी मार्मिकता से बार-बार उद्घाटित किया है—
हर पुरानी बाँसुरी में फूँक मारो/फिर सजाओ झूठ का नक्कारखाना/
किन्तु तूती की नहीं आवाज़ आये/इस तरह होता रहे/गाना बजाना । (अब सदन में अट्टहासों को सजाओ, पृ. 19)
xx xx
चुभ रहा है सत्य जिनकी हर नज़र को/वे उडाना चाहते हैं/आँधियों से/
या कोई निर्जीव सुविधा/फेंक मुझको/बाँध देना चाहते हैं संधियों से। (थपथपाये हैं हवा ने, पृ. 26)
xx xx
जल रहे जनतंत्र की/ज्वाला प्रबल हो/किस अराजक मोड़ पर ठहरी हुई है/
और आदमक़द हुए षड्यन्त्र बढ़कर/छल-प्रपंचों की पहुँच गहरी हुई है। (आ गया अन्धी सुरंगों से, पृ. 27)
xx xx
स्वप्नधर्मा रौशनी/फेंकी गयी यों/हर दिवस की आँख/चुँधियाने लगी है/
धनकुबेरों की सबल वित्तीय पूँजी/लाभधर्मा मन्त्र/दुहराने लगी है। (ओस बूँदों में चमकता, पृ. 32)
xx xx
आजकल सन्देह/हर विश्वास के आगे खड़ा है/
और दैनिक व्यस्तता का नाप/दिन से भी बड़ा है/
हर व्यथित उत्साह पर अवसाद की होती विजय है/
लग रहा सौजन्य भी संदिग्ध/यह कैसा समय है! (लग रहा सौजन्य भी संदिग्ध, पृ. 113)

किसान, मजदूर, सफाईकर्मी आदि आम आदमी जनतन्त्र के नायक हैं, लेकिन आज उन्हें हाशिये पर भी स्थान नहीं मिल रहा। सत्ता के ठेकेदारों ने केवल वोटों की ख़ातिर सदियों से उनका दोहन किया है। नवगीतकार ने आने कवि-धर्म को पहचाना है और इस दोहन के विरुद्ध खड़े होकर उसके दुख-दर्द को बड़ी ही मार्मिकता के साथ वह वाणी दी है जो पाठक को तिलमिला देती है—
दोपहर की/चिलचिलाती धूप में जो/खेत-क्यारी में/निराई कर रहा है/
खोदता है घास-चारा/मेड़ पर से/बाँध गट्ठर ठोस/सिर पर धर रहा है/
है वही नायक/समर्पित चेतना का/मैं उसी को गा रहा/उद्घोष में भी ।
जो रुके सीवर/लगा है खोलने में/तुम जहाँ पर/गन्ध से ही काँपते हो/
दूरियों को नापकर/चढ़ता शिखर पर/तुम जहाँ दो पाँव/चलकर हाँफते हो/
मैं उसी की/मौन भाषा बोलता हूँ/प्राणपण से/दनदनाते रोष में भी । (ताप मैं भरता रहूँ आक्रोश में भी, पृ. 23)
अथवा,
गुलमुहर के गीत ही गाते रहे/दूब को हर बार ठुकराते रहे।
वे सजाने में लगे/फुलवारियाँ/हम बचाने में लगे किलकारियाँ/
आदमियत को बचाने के लिए/डाँट हम हर ओर से खाते रहे।
बस महावर और मेंहदी ही लिखे/पाँव के छाले नही/जिनको दिखे/
रोपती जो धान गीले खेत में/वह मजूरिन देख ललचाते रहे। (गुलमुहर के गीत ही गाते रहे, पृ. 31)
या फिर,
जहाँ खड़े थे, तुमने आकर/पीछे और धकेल दिया है/
तुमको अभिनन्दित करने के/क्या हमने अपराध किया है?
चाटुकार ही पास तुम्हारे/खड़े हुए सहयोगी बनकर। (झुकी कमर टूटे कन्धों से, पृ. 77)

लोकतन्त्र में विपक्ष की भूमिका का महत्त्व किसी से छिपा नहीं है, लेकिन आज सत्ता की अराजकता का सबसे बड़ा कारण यही है कि प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाला कोई नहीं है : न कोई व्यक्ति, न पार्टी और न ही मीडिया। जो थे, उन्हें विविध प्रलोभनों से सत्ता अपनी ओर मिला रही है। विपक्षविहीन लोकतन्त्र और धृतराष्ट्र के शासन में कुछ अन्तर नहीं। सत्ता अपनी निरंकुशता को लोकतन्त्र की परिधि में लाने को नित नयी रणनीति अपना रही है। नवगीतकार ऐसे में यथास्थिति के विरुद्ध प्रतिपक्ष की भूमिका में उतरता है—
कल तलक था धुर विरोधीपन/अब समर्थन में गरजते हैं।
जब असंगत मेह की बूँदें/हैं बरसतीं/ले विषैला जल/
अम्लता की पोटली खोले/आँगनों में फेंकती हलचल/
अब नज़र मिलती नहीं उनकी/मंच पर ही रोज़ सजते हैं। (कल तलक था धुर विरोधीपन, पृ. 46)
अथवा,
बिका मीडिया फेंक रहा है/मालिक की मंशा परदे पर/
और साथ में बेच रहा है/बाबाओं के भी आडम्बर/
अगर नहीं सो रहे उठो अब/अपने मुँह पर छींटे मारो। (जल्दी से आलस्य उतारो, पृ. 86)
या फिर,
घोषणा है, बन्द कर दो/सब झरोखे-द्वार-खिड़की/
रौशनी की किरण तक भी/आ न पाये इस भवन में । (घोषणा है बन्द कर दो, पृ. 52)

जैसा कि संग्रह का शीर्षक है, नवगीतकार अनेक गीतों में यथार्थ के आकलन के साथ-साथ उदात्तता की कामना करता है। वह अरण्यरोदन-भर नहीं करता, विकल्प तलाशता है और आत्मशोधन से आत्मविश्वास को और प्रबल करता है। वह कबीर और रैदास के अवदान को रेखांकित कर उनकी परंपरा को आगे बढाने की बात करता है और आधुनिक सन्तों, जिन्हें सीकरी से ही काम है, की जमकर ख़बर लेता है। वह बुद्ध के दर्शन में रमने का भी आह्वान करता है, तो अध्यात्म-दर्शन को सकारात्मकता से जोड़ते हुए ठगी और पाखण्ड का विरोध दर्ज़ करता है।... रचना के पड़ावों पर उसने अनेक बार संतुलित सोच और समन्वय की संभावनाओं की तलाश की है और यह कामना की है कि कुछ ऐसा किया जाए कि भीड़ का हिस्सा बन चुके रोबो जैसे हम प्रेम और संवेदना से भरे जीवन को मानवीय गरिमा के साथ जी सके—
प्रेम की, सौहार्द की/सच्चाइयों को शब्द देकर/जागती जीती रहें/सब कारुणिक संवेदनाएँ/
प्राणमय विस्तार हो/हर रोम में अनुभूतियों का/शान्त मन सद्भावना/संचेतना के गीत गाएँ/
आइए, अभियन्त्रणाओं का समय है/हर्षमय संगीत हो/उत्कर्ष पर अब। (समय है सम्भावना का, पृ. 50)
अथवा,
अनसुनी ही लौट आयी/चीख मेरी, पास मेरे/भीड़ में से भी गुज़रकर/हादसों के इस शहर में ।
xx xx xx
हो सके तो अब उठें/समवेत स्वर ले जूझने को/मानवी विश्वास की गरिमा/न डूबे अब ज़हर में।
(अनसुनी ही लौट आयी, पृ. 82)
अथवा,
कुछ उठे यह धरा/कुछ झुके यह गगन/
मन मगन रागिनी गुनगुनाता रहे/भोर से भोर तक गीत गाता रहे। (कुछ उठे यह धरा, पृ. 67) और,
चलो हम भीड़ में खोजे/कहीं थोडा अकेलापन/
मिलन के मुक्त पल लेकर/मयूरा मन करे नर्तन/
किसी मादक छूअन की/गन्ध-सी महके हवाओं में/
दिशाओं में क्षितिज तक/प्राण का होता रहे कम्पन। (नदी के द्वीप पर ठहरा, पृ. 68)

अभिव्यक्ति की आकर्षक शैली, बोलचाल और तत्सम शब्दों से सज्जित भावानुरूप भाषा और विभिन्न छन्दों में सुगठित ये गीति-रचनाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति की रक्षा करते हुए अपने लक्ष्य में पूर्णतया सफल हैं। नवगीत की शक्ति को पहचानकर रचनाकार ने शिल्प और वस्तु में सामंजस्य बिठाकर यथार्थ को अधिकांशतः प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से उद्घाटित किया है। रचनाकार ने नवगीतों की भाषा में अपेक्षित लय के लिए गद्य कविता की लय-प्रविधि को अपनाते हुए पंक्तियों में यथावश्यक यति देकर अभिव्यक्ति को पैना किया है, जैसा कि उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है। यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि आजकल ऐसे नवगीतों की भरमार है जो सपाटबयानी का शिकार हैं और वे पाठक के मर्म को छू भी नहीं पाते, उन पर घटित होने की बात ही क्या! ऐसे में समीक्ष्य संग्रह अपनी पैनी अभिव्यक्ति और विकल्प की तलाश करती उद्भावना से विश्वास जगाता है कि लोकचेतना से लैस नवगीत अपनी भूमिका में किसी सजग प्रहरी की भाँति डटा हुआ है।... आज के युग के सत्य-तथ्य में हस्तक्षेप करते इस नवगीत संग्रह का हिन्दी संसार द्वारा अवश्य ही स्वागत होगा ।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

नींद कागज की तरह- यश मालवीय / निर्मल शुक्ल


भाषा की सुदृढ़ सम्प्रेषण भूमि पर बौद्धिक संवेदनशीलता से तरल आकार प्रदान करने वाले समर्थ गीतकार यश मालवीय आज के साहित्यिक परिदृष्य में लोकानुभूति के सधे संवाहक हैं।

यश मालवीय नवगीतयुग की प्रारम्भिक कड़ियों में विशिश्ट कहे जाने वाले कवि उमाकान्त मालवीय के सुपुत्र हैं। इन्हें विरासत में गीत का युगबोध प्राप्त हुआ है। अपने पिता से वाहिक रूप में प्राप्त हुई संवेदनशीलता एवं प्रयोगधर्मी बहुआयामी  सर्जनाशक्ति उन्हीं की तरह इन्हें भी अपनी पहचान बनाने में सहायक रही है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में मैं समझता हूँ कि यश मालवीय एक संधिकाल के कवि हैं। वरिष्ठ कवियों की लम्बी फेहरिस्त के बाद नवगीत में नई पौध के आगमन के पहले के कवि कहे जा सकते हैं। नवगीत के इतिहास में जहाँ पहली कड़ी समाप्त होती है और दूसरी कड़ी प्रारम्भ होती है, वहीं पर इस महत्वपूर्ण विलक्षण गीतकार को रखा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। समकालीन परिदृष्य में यश मालवीय के सृजन में विमुक्त का स्पष्ट चिंतन है। यही कारण है कि पाठकों द्वारा सहज स्वीकार किये जाते हैं।

गीत के प्रति चिंतनशील मस्तिष्क निरंतर अंतश्चेतना में नए विम्ब, नई प्रतीक योजना में व्यस्त दिखता है। यश मालवीय अपने नवीनतम गीत-संग्रह ‘नींद कागज की तरह’ के द्वारा वस्तुगत एवं शिल्पगत दोनों दृष्टियों को परिवर्तन की रचनाधर्मिता की नैनो तकनीक का दर्शन कराते हुए कहता है कि-
नवगीत के कविबोध और समग्रता में गीत के संसार के विस्तार ने समकालीन कविता के बरअक्स हिन्दी नवगीत को पूरे घत्व के साथ सम्भव बनाया है। जिस तरह ग़ज़ल महबूबा की जुल्फों के पेंचोखम से मुक्त हुई है, गीत भी छायावाद की विशाल छाया से बाहर आया है। उसके कथ्य का आसमान और अधिक विस्तृत हुआ है। शिल्प के स्तर पर भी उसने नई जमीनें तोड़ी हैं। व्यष्टि से समष्टि की ओर प्रयाण किया है। आम आदमी के दुखदर्द से बावस्ता हुआ है। आज का युगबोध खुरदुरी मगर र्प्याप्त अर्थभरी भंगिमाएँ और तेवर लेकर उसकी मारक एवं चुटीली भावाभिव्यक्ति में शामिल हुआ है। वह सामान्य आदमी की बोली-बानी में उजागर हुआ है। उसने संवाद की मुद्रा अपनाई है। केवल किताबी भर रह जाने से उसने गुरेज किया है। जरूरत पड़ी तो उसने अंग्रेजी, अरबी, फारसी और उर्दू का निस्संकोच इस्तेमाल कर अपनी हिन्दी को और अर्थवान बनाया है। लोकभाष और देशज शब्दों को पूरी सलाहियत के साथ बरता है। इसे बरतने में या सर्जनात्मक बर्ताव में कहीं भी उसकी लय खण्डित नहीं हुई है। 

प्रस्तुत संग्रह के गीतों की सृजन प्रक्रिया से गुजरते हुए कवि और कविता को पृथक-पृथक रखा जाना सम्भव नहीं। संवेदना, अनुभूति हॅंसते-मुस्कराते, कभी अवसाद पूर्ण भावभंगिमाओं में तो कहीं साधारण मुद्रा में वार्तालाप करती प्रतीत होती है। उनके गीतों के बीच से चलकर एक आश्वस्ति होती है। अपनी तमाम यथार्थबोधी चेतना के बीच ये गीत नवीन से अनुप्राणित हैं। समाज को उबारने के लिए दर्पण दिखाते हुए उनकी चेतना और प्रेरणा प्रतिबिम्बित करते हैं। समाज की गन्तव्यहीन यात्रा में समाधान हेतु प्रेरक संकेतों में यश मालवीय की रचनायें आधुनिक जीवन की हिमायती और पक्षधर हैं। 

आज के उलझे हुए जीवन की तरह उसमें उलझाव भी है और युगीन जटिल सन्दर्भों को सहज रूप से व्यक्त करते हुए इन्हें पूरी पठनीयता और सम्पेषणीयता के साथ प्रस्तुत किया गया है-
चलो डुबोकर बिस्कुट थोड़ी चाय पियें
खिली धूप में बैठें दो पल साथ जियें
बादल वाले गीत दरमियाँ खोलें भी
तहे हुए किस्से कहानियाँ खोलें भी
बातों की तुरपन खोलें
कुछ बुनें सियें।

हमें पता है कुआँ 
कहाँ कब खाई है
लिखते जाना भी तो एक लड़ाई है
सब कुछ मिलता सम्वेदन के घर जाकर
शब्द बता देते हैं धीरे से आकर
ढाल कहाँ है
कैसी कहाँ चढ़ाई है। 

यश मालीवय कृत नवीनतम गीत संग्रह ‘नींद कागज की तरह’ में उन्होंने अपने ६५ गीतों को सुरूचिपूर्ण ढंग से संकलित किया है। इस कृति का आभ्यांतर ‘नींद कागज की तरह’-नींद एक प्रतीक है, जिसके माध्यम से आज के समय में जीवनमूल्यों के क्षरण को समझाते हुए, उस पर चिन्तित होते हुए संवेदनशील होकर उसका प्रतिबिम्ब दिखाया गया है। एक चिन्तनशील मस्तिष्क  पाठक को कवि की मनःप्रतीति से दो चार कराते देखा जा सकता है। यही कवि का रचना संसार है, जो गीतों की प्रभावशक्ति की बहुत बड़ी सफलता है, देखें-
याद आए नींद में ही काम कितने
मुँह चिढ़ाने लगे टूटे हुए सपने
हर सुबह जैसे लगे
ऊॅंची पहाड़ी
बहुत नीली, बहुत गहरी
बहुत गाढ़ी
नींद कागज की तरह सौ बार फाड़ी   

इसी क्रम में, आज जीवन की आपधापी में मॅंहगाई का स्वर, लाचारी का ज्वर, कठिन समय में जीवन की विकृतियों का कठोर सच बोल रहा है-
चिढ़ा रहा मुँह चावल, साधो!
अरहर आँख दिखाए
हमें ले रहे अपनी जद में
महँगाई के साए
हर अनुपात शर्म सा 
चुभता है तुतली बानी में
है सिमेण्ट बालू सा रिश्ता 
दूध और पानी में
रोता है भविष्य बच्चे सा
भूखा ही सो जाए
चूल्हे चढ़ी पतीली खुलकर
फूट फूट कर रोई
महँगी गैस रसोई साधो!
कठिन जिंदगी, गीला आटा
गुम रोटी के सपने
एक व्यवस्था आत्मघात की
मन में लगी पनपने
घर आई लक्ष्मी ने
आँसू की माला पोई 

इस  विषम स्थिति में चिंता और क्षोभ व्यक्त हुआ है, देखें-
थहा न पाती भूख
कि पत्थर हुई फूल की थाली
खाने को बस बची रह गई
माँ बहनों की गाली

होली दीवाली भी घर में
सेंध लगाने आए

घने पेड़ की छाया भी है
काँटेदार, कॅंटीली
उसका क्या जो मुखिया की है
आँखें गीली-गीली

गीला सा आटा परात में
सौ सौ नाच नचाए

घर बाहर भी इससे अधिक मार्मिक अभिव्यक्ति क्या होगी। मूल्यों के क्षरण के वास्तविक रूप का चित्रांकन है यह प्रकल्पना। इतना ही नहीं कृति में कवि के अंतरंग स्निग्ध चित्र भी मिलेंगे-
भरी बरसात में भी
दिल दहकते हैं
तुम्हारे साथ 
काँटे भी महकते हैं
तुम्हारी रोशनी हो
तो अॅंधेरा क्या
तुम्हारे सामने
खिलता सवेरा क्या
तुम्हारे गीत पर
प्याले बहकते हैं

कवि एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज के सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अधिक संवेदनशील है। अपने इसी स्वभाव के कारण वह सामाजिक, सांस्कृतिक जीवनमूल्यों का साक्षात करता है। आगे बढ़कर वह पाठकवृन्द अथवा सुधी समाज को एक दिशा देने का सद्प्रयास करता है। इसी में उसकी रचनाधर्मिता का प्रयोजन, उद्देष्य और नैतिक बोध स्पष्ट होता है। 

यश का कवि घर, समाज में रहकर मात्र भोक्ता बन कर नहीं अपितु औचित्य स्थापन के प्रति पग बढ़ाते हुए अपना साहित्यकार धर्म का निर्वाह करता है। इसी परिप्रेक्ष्य में अथवा यों कहें भावभूमि पर कवि की कलम चली है। 

यही सुसंस्कार यश मालवीय की गीत रचनाओं में मिलते रहे हैं। वे सुख के साथ-साथ दुखों पर अपनी सम्वेदना दर्शाते हुए कहते हैं-
सिर्फ सुखों का नहीं
दुखों का भी अपना घनत्व होता है
हाहाकर भले कैसा हो
मन में सन्नाटे बोता है
दुख की भी गरिमा होती है
आँसू होते हैं चमकीले
बहुत पास से छू लेते हैं
आकर बादल गीले गीले
जान न पातीं दीवारें भी
कब कोई कितना रोता है

जीवन की विसंगतियों के साथ-साथ प्रकृति, मौसम आदि भी कवि के अंतरंग को छूते हैं। शीत का मौसम-
भूली बिसरी चोट दुखाने
मौसम बदला है
भारी बक्से से, सर्दी का
कपड़ा निकला है
देह हमारी और पिता की
सदरी बोल रही
नेप्थलीन वाली यादों की
खुश्बू डोल रही
माँ का शाल, लक्ष्मी के
काँधे पर फिसला है

एक बिम्ब और-
ढीठ सर्दी को जरा सा मुँह चिढ़ाने
धूप में बैठें
चलो दाढ़ी बनाएँ

बसन्त का चित्र भी-
फिर बसन्त आने को है
सूनापन गाने को है

या फिर-
भूली बिसरी चोट दुखाने
फिर बसन्त आया
घाव लगाने, घाव सुखाने
फिर बसन्त आया

यश मालवीय आशावादी किन्तु विद्रोही हैं। नैराश्य को सिर्फ जाना ही नहीं भोग भी लिया है, क्योंकि जीवन सुन्दर-असुन्दर, गुण-दोष, सुख-दुख, अच्छे-बुरे का समावेश है, किन्तु जीवन की सार्थकता इसी बात पर निहित है कि इस मायाजाल में जीकर भी इंसान दिल से ढूँढ सके-
 अनबीती सी तिथियाँ होने दो
चोटों को स्मृतियाँ होने दो
जख्म याद बन जायेंगे
तो नहीं पिरायेंगे
आँखों के जल में ही
मन का दिया सिरायेंगे
रचना की स्थितियाँ होने दो
चुप चुप सी आहुतियाँ होने दो

यश की कविता में गहरी काव्यात्मकता है। मंच हॅंसोड़ और फूहड़ काव्यात्मकता से भिन्न विरोधाभासों को गम्भीरता से उकेरने वाले यश मालवीय गहरे मानवीय सरोकारों और चिन्ताओं के कवि हैं। उन्हें अप्रियता, कुरूपता, विसंगति मथती है, उद्वेलित करती है-
आँसू और खुशी की 
कोई नदी उबलती देखी
अस्पताल के आगे से 
बारात निकलती देखी
एक आँख का हॅंसना देखा
एक आँख का रोना
शादी वाला कार्ड
पत्र का कटा हुआ सा कोना

एक मोमबत्ती साँसों की 
जली पिघलती देखी

यश के गीतों की विषयवस्तु और शिल्प दोनों अनुभूति और अभिव्यक्ति में एक सन्तुलन है। भाषा खड़ी बोली, मृसण प्रसारमयी है। भाषा के प्रवाह में देशज व कहीं-कहीं अंग्रेजी के शब्द सहज आकर्षण हैं। समग्र कृति के अनुशीलन के पश्चात मैं यह कहना चाहता हूँ कि गीत के सशक्त हस्ताक्षर यश मालवीय की इस कृति में उनकी गवेशणात्मक दृष्टि समय और समाज के अच्छे पारखी रूप का परिचय 
मिलता है। 
बाँधता है घड़ी 
लेकिन
वक्त का बीमार है
ये हमारे दौर का फनकार है

हैं कई चेहरे कि जिनमें
एक भी अपना नहीं है
आग ठण्डी है, किसी भी
आग में तपना नहीं है

बंद दरवाजे सरीखा
या कि चुप दीवार है
ये हमारे दौर का फनकार है

इसमें सन्देह नहीं कि कवि की चेतना इन नाना विसंगतियों के मध्य सुभासित, सुभाषित चित्त की उर्वर भूमि खोजती है, जहाँ पर सुसंस्कृति के बीज पुनः बोये जा सकें। जिसका परिणाम अच्छा हो। ‘नींद कागज की तरह’ गीत संकलन सर्वथा निर्दोष और सप्रयोजनीय है। गीत- नवगीत संग्रह - नींद कागज की तरह, रचनाकार- यश मालवीय, प्रकाशक- अंजुमन प्रकाशन,  इलाहाबाद। प्रथम संस्करण- २०१४, मूल्य- रूपये १२०/-, पृष्ठ- ११२, समीक्षा - निर्मल शुक्ल।